नवरात्रि के दौरान देवी दुर्गा की पूजा व्रत और विशेष अनुष्ठान
देवी दुर्गा की पूजा हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण और लोकप्रिय पूजाओं में से एक है देवी दुर्गा को शक्ति साहस और धर्म की रक्षक के रूप में पूजा जाता है पुराणों और शास्त्रों में वर्णित है कि जब-जब संसार में अधर्म और अन्याय बढ़ा तब-तब देवी दुर्गा ने अपने विभिन्न रूपों में अवतरित होकर दुष्ट शक्तियों का नाश किया और धर्म की रक्षा की इसी कारण इन्हें अपराजिता “जगदम्बा” और शक्ति स्वरूपिणी कहा जाता है।
नवरात्रि के अवसर पर देवी दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। चैत्र और शारदीय नवरात्रि वर्ष में दो बार पड़ते हैं। शारदीय नवरात्रि आश्विन माह में और चैत्र नवरात्रि वसंत ऋतु में मनाई जाती है इन नौ दिनों में भक्त माँ दुर्गा के नौ रूपों की पूजा करते हैं। माँ दुर्गा के ये नौ रूप हैं शैलपुत्री ब्रह्मचारिणी चंद्रघंटा कूष्मांडा स्कंदमाता, कात्यायनी कालरात्रि महागौरी और सिद्धिदात्री हर रूप का विशेष महत्व है और उस रूप की प्रतिदिन पूजा की जाती है

नवरात्रि के दौरान भक्त सात्विक जीवन >
पूजा की शुरुआत कलश स्थापना से होती है मिट्टी से भरे गमले में जौ बोए जाते हैं और उस पर जल से भरा कलश स्थापित किया जाता है इस कलश को वरुण देवता का प्रतीक माना जाता है और इसमें नारियल आम के पत्ते और लाल कपड़ा इस्तेमाल किया जाता है इसके बाद पूरे नौ दिनों तक माता की मूर्ति या चित्र के सामने दीपक जलाकर पूजा की जाती है। दुर्गा सप्तशती देवी भागवत और दुर्गा चालीसा का विशेष पाठ किया जाता है
व्रत और उपवास इस पूजा का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैंनवरात्रिके दौरान भक्त सात्विक जीवन जीते हैं। अनाज लहसुन और प्याज का सेवन नहीं किया जाता है अधिकांश लोग फल खाते हैं या दिन में केवल एक बार भोजन करते हैं। साबूदाना कुट्टू के आटे की पूरी आलू मूंगफली और दूध-दही का सेवन मुख्य रूप से किया जाता है ऐसा माना जाता है कि उपवास करने से मन और शरीर शुद्ध होता है और भक्त का ध्यान पूरी तरह से माँ दुर्गा की भक्ति में केंद्रित होता है
देश भर में नवरात्रि के अवसर पर दुर्गा पूजा अलग-अलग तरीकों से मनाई जाती है उत्तर भारत में कई जगहों पर रामलीला का मंचन होता है और दशमी के दिन रावण दहन किया जाता है। पश्चिम बंगाल असम और ओडिशा में दुर्गा पूजा भव्य पंडालों और कलात्मक मूर्तियों के माध्यम से मनाई जाती है। चार दिनों तक पूरे समाज में उत्सव का माहौल रहता है। विशाल पंडाल रोशनी से सजी सड़कें और सांस्कृतिक कार्यक्रम इस उत्सव को और भी आकर्षक बना देते हैं

पूजन की परंपरा >
गुजरात और महाराष्ट्र में दुर्गा पूजा का सबसे खास रूप गरबा और डांडिया है रंग-बिरंगे परिधानों में महिलाएँ और पुरुष रात भर गरबा नृत्य करते हैं ढोल-नगाड़ों की धुन पर पूरा शहर भक्ति और उत्सव से सराबोर हो जाता है
नवरात्रि के अंतिम दिन कन्या पूजन की परंपरा निभाई जाती है छोटी कन्याओं को देवी का रूप मानकर उन्हें घर बुलाया जाता है उन्हें भोजन कराया जाता है और दक्षिणा व उपहार दिए जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि कन्या पूजन से माँ दुर्गा प्रसन्न होती हैं और घर में सुख-समृद्धि आती है
देवी दुर्गा की पूजा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है बल्कि जीवन के गहरे संदेश भी देती है। यह हमें सिखाती है कि बुराई चाहे कितनी भी शक्तिशाली क्यों न हो, अंतत अच्छाई और सच्चाई की ही जीत होती है। माँ दुर्गा शक्ति की प्रतीक हैं और उनकी पूजा हमें आत्मविश्वास साहस और धर्म की रक्षा करने की प्रेरणा देती है
विजयदशमी का दिन इस पूजा का समापन है जब हमें यह संदेश मिलता है कि यदि हम सत्य और धर्म के मार्ग पर चलें तो हर कठिनाई और बुराई पर विजय संभव है इस प्रकार देवी दुर्गा की पूजा न केवल भक्ति और श्रद्धा का प्रतीक है, बल्कि जीवन को सकारात्मक और अनुशासित बनाने का मार्ग भी दिखाती है
शारदीयनवरात्रिहिंदू धर्म का महत्वपूर्ण त्योहार और खास व्रत
नवरात्रि में कन्या पूजन का महत्व
— Sanatanii (@Sanatanii_) October 11, 2024
नवरात्रि में कन्या पूजन का विशेष महत्व है। यह पूजन मां दुर्गा के नौ रूपों को समर्पित होता है और नवरात्रि के आठवें (अष्टमी) या नौवें (नवमी) दिन किया जाता है। इस पूजन में 2 से 10 साल की कन्याओं को देवी के रूप में पूजकर आशीर्वाद लिया जाता है,… pic.twitter.com/65vCplHhda

