राजा बलराम देव के शासनकाल की खास पर्था नुआखाई

राजा बलराम देव के शासनकाल की खास पर्था नुआखाई

ओडिशा का पश्चिमी भाग अपनी सांस्कृतिक परंपराओं और कृषि उत्सवों के लिए विशेष रूप से जाना जाता है। इन्हीं त्योहारों में से एक है नुआखाई। यह त्योहार केवल एक धार्मिक त्योहार नहीं है बल्कि किसानों और समाज के जीवन का एक गहरा हिस्सा है। इसकी जड़ें प्राचीन इतिहास में निहित हैं और इसे विशेष रूप से राजा बलराम देव के शासनकाल से जुड़ी परंपरा के रूप में जाना जाता है

धार्मिक और सांस्कृतिक कर्तव्य >

राजा बलराम देव ओडिशा के छत्रपति माने जाते थे जिन्होंने संबलपुर साम्राज्य की नींव रखी। वे अपनी प्रजा से गहराई से जुड़े हुए शासक थे और उनकी नीतियाँ किसानों के कल्याण पर केंद्रित थीं उस समय खेती जीवन का मुख्य आधार थी। वर्षा आधारित कृषि में जब भी कोई नई फसल पकती थी तो उसका पहला भाग धरती माता और देवी-देवताओं को अर्पित करना एक धार्मिक और सांस्कृतिक कर्तव्य माना जाता था। इसी विचार को एक संगठित रूप देने के लिए राजा बलराम देव ने नुआखाई उत्सव को राजकीय मान्यता प्रदान की

नुआखाई शब्द का अर्थ है नया भोजन इसमें खेत से धान का पहला दाना घर लाया जाता है सबसे पहले इसे देवी समलेश्वरी को अर्पित किया जाता है, जिन्हें पश्चिमी ओडिशा की कुलदेवी माना जाता है। उसके बाद पूरा परिवार और समाज के लोग मिलकर इस नए भोजन का सेवन करते हैं। कहा जाता है कि राजा बलराम देव ने यह परंपरा इसलिए शुरू की ताकि किसान और आम जनता नए धान के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर सकें और सामूहिक रूप से इस खुशी को साझा कर सकें

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सामाजिक एकता >

इस त्यौहार का सबसे बड़ा महत्व सामाजिक एकता में देखा जाता है जब नुआखाई का समय आता है तो परिवार के सभी सदस्य चाहे वे कहीं भी रहते हों अपने गाँव लौट आते हैं। राजा बलराम देव के शासनकाल में यह व्यवस्था थी कि जिस दिन देवी को नया अनाज अर्पित किया जाएगा उस दिन पूरा क्षेत्र मिलकर इसे मनाएगा। यही कारण है कि आज भी नुआखाई के लिए एक निश्चित लग्न निर्धारित किया जाता है और उस समय सभी लोग अपने-अपने घरों और मंदिरों में नया धान अर्पित करते हैं

नुआखाई केवल देवी-देवताओं की पूजा तक ही सीमित नहीं है बल्कि यह परिवार और समाज के बीच संबंधों को मजबूत करने का भी एक माध्यम है। राजा बलराम देव ने इस त्यौहार को सामाजिक समरसता का प्रतीक बनाया। इस दिन छोटे-बड़े सभी लोग मिलते हैं बड़ों का आशीर्वाद लेते हैं और झगड़े भूलकर एक-दूसरे के साथ प्रेम से रहते हैं। इस परंपरा को नुआखाई जुहार कहा जाता है। इसका अर्थ है नए अनाज का सम्मान करते हुए एक-दूसरे से जुड़ना और सद्भाव बढ़ाना

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नृत्य परंपरा>

राजा बलराम देव की इस परंपरा का प्रभाव आज भी जीवंत है। गाँवों में ढोल बजाए जाते हैं लोक नृत्य किए जाते हैं और पारंपरिक व्यंजन बनाए जाते हैं किसान नए अनाज से बने पीठे और मिठाइयाँ तैयार करते हैं और बाँटते हैं। नुआखाई केवल खेतों और अनाज का त्योहार नहीं है बल्कि ओडिशा की आत्मा का उत्सव है। यह किसानों की कड़ी मेहनत प्रकृति की उदारता और समाज की एकता का प्रतीक है

बदलते समय के साथ कई परंपराएँ लुप्त हो जाती हैं लेकिन नुआखाई की प्रथा आज भी उतनी ही जीवंत है जितनी राजा बलराम देव के समय में थी। यह त्योहार पश्चिमी ओडिशा की पहचान बन गया है और वहाँ के लोगों की संस्कृति में गहराई से समाया हुआ है। राजा बलराम देव द्वारा स्थापित यह विशेष परंपरा भावी पीढ़ियों को अपनी जड़ों और कृषि संस्कृति से जोड़ने का काम करती है यही कारण है कि नुआखाई केवल एक त्योहार नहीं बल्कि ओडिशा की समृद्ध परंपरा और इतिहास की एक अमूल्य धरोहर है

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