नुआखाई त्योहार किसानों का सबसे बड़ा त्योहार माना जाता है और वे इसकी तैयारी बहुत पहले से शुरू कर देते हैं खेतों में धान की बालियाँ पकने लगती हैं तभी से किसान इस दिन का इंतज़ार शुरू कर देते हैं। सबसे पहले वे अपनी फसल की देखभाल में और भी ज़्यादा सावधानी बरतते हैं ताकि नई फसल की अच्छी तरह से सुरक्षा हो सके त्योहार से कुछ दिन पहले घर की साफ़-सफ़ाई की जाती है मिट्टी के घरों को गोबर और मिट्टी से लीपा जाता है ताकि वातावरण शुद्ध हो। किसान अपने खेतों से सबसे अच्छी और ताज़ा धान की बालियाँ चुनकर अलग रख लेते हैं जिन्हें देवी को अर्पित किया जाता है
परिवार की महिलाएँ और बहुएँ इस दिन के लिए विशेष व्यंजन बनाती हैं पीठा मंडा अरसा और नए धान से बने चावल दाल और सब्ज़ियाँ तैयार की जाती हैं किसान सुबह जल्दी उठते है स्नान करते हैं और नए कपड़े पहनते हैं पुरुष पारंपरिक धोती और गमछा पहनते हैं जबकि महिलाएँ संबलपुरी साड़ियाँ पहनती हैं पूजा के लिए घर में या गाँव के किसी सार्वजनिक स्थान पर देवी समलेश्वरी की मूर्ति या प्रतीक सजाया जाता है धान की बालियां नये चावल का दलिया दही और मिठाई को एक थाली में सजाकर देवी को अर्पित किया जाता है
खास पूजा >
इस दिन किसान हल बैल और कृषि उपकरणों की पूजा भी करते हैं। बैलों को नहलाकर उन्हें रंग-बिरंगे कपड़े और फूल चढ़ाए जाते हैं। उनके सींगों पर तेल लगाया जाता है और उनके गले में घंटियाँ बाँधी जाती हैं ऐसा माना जाता है कि खेती में बैल किसान के सबसे बड़े साथी होते हैं इसलिए इस दिन उनका सम्मान करना ज़रूरी है
पूजा और भोग लगाने के बाद किसान अपने परिवार के साथ बैठकर नए अन्न का पहला निवाला ग्रहण करते हैं इसके बाद गाँव में रिश्तेदारों और पड़ोसियों के घर जाकर नुआखाई जुहार किया जाता है, यानी बड़ों का आशीर्वाद लेकर एक साथ त्योहार मनाया जाता है। शाम को ढोल-नगाड़ों और संबलपुरी लोक नृत्य के साथ पूरे गाँव में उत्सव का माहौल बन जाता है किसान नृत्य और गीतों के माध्यम से अपनी मेहनत और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं

इस तरह नुआखाई के दिन किसान अपने खेत घर परिवार और समाज को एक सूत्र में पिरोते हैं उनकी तैयारियाँ सिर्फ़ पूजा तक सीमित नहीं रहती बल्कि यह त्योहार उनके श्रम आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक बन जाता है

