नेपाल की जीवित देवी कुमारी एवं इंद्र देव की पूजा का त्यौहार एवं प्राचीन परम्पराएँ

नेपाल की जीवित देवी कुमारी एवं इंद्र देव की पूजा का त्यौहार एवं प्राचीन परम्पराएँ

नेपाल का इंद्र जात्रा उत्सव केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं है बल्कि यह सदियों पुरानी परंपराओं मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत उदाहरण है। हर साल भाद्रपद अगस्त-सितंबर के महीने में काठमांडू में यह उत्सव बड़े धूमधाम से मनाया जाता है इस अवसर पर देवी-देवताओं, जीवित देवी कुमारी और इंद्र देव की पूजा की जाती है। इसकी प्राचीन परंपराएँ आज भी उसी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाई जाती हैं जैसे सैकड़ों साल पहले निभाई जाती थीं

इंद्र जात्रा की सबसे खास परंपरा लिंगो की स्थापना है। लिंगो एक विशाल लकड़ी का स्तंभ होता है जिसे तांबे और अन्य धातुओं से सजाया जाता है। इसे काठमांडू दरबार चौक पर स्थापित किया जाता है। यह परंपरा इंद्र देव के सम्मान में निभाई जाती है और इसे शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। लिंगो की स्थापना की पूरी प्रक्रिया बहुत पवित्र मानी जाती है और स्थानीय लोग इसमें एक साथ भाग लेते हैं

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नृत्य परंपरा >

एक अन्य महत्वपूर्ण परंपरा मुखौटा नृत्य की है इन्हें लाखे नृत्य या देव-नृत्य भी कहा जाता है ये नृत्य विशेष मुखौटे पहनकर किए जाते हैं जिनमें देवताओं राक्षसों और पौराणिक पात्रों की झलक दिखाई देती है ये नृत्य न केवल मनोरंजन के लिए होते हैं बल्कि धार्मिक मान्यताओं और प्राचीन कथाओं को जीवंत करने का माध्यम भी बनते हैं इन्हें देखने के लिए बड़ी संख्या में लोग उमड़ पड़ते हैं

इंद्र यात्रा का सबसे पवित्र और लोकप्रिय भाग जीवित देवी कुमारी की रथ यात्रा है। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि कुमारी शक्ति और देवी दुर्गा का एक रूप हैं। उनकी रथ यात्रा काठमांडू की गलियों से होकर गुजरती है और भक्त उनके दर्शन करके उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। रथ यात्रा के दौरान कुमारी को लाल वस्त्र स्वर्ण आभूषण और दिव्य श्रृंगार से सुसज्जित किया जाता है। राजा या राष्ट्रपति भी इस परंपरा में भाग लेते हैं और देवी से आशीर्वाद प्राप्त करते हैं

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पूजा की परंपरा >

इंद्र जात्रा भूत-प्रेतों की पूजा की परंपरा से भी जुड़ी है प्रचलित मान्यताओं के अनुसार इस अवसर पर मृत आत्माओं का सम्मान किया जाता है और उनके लिए दीप जलाए जाते हैं इसे बाल जात्रा भी कहा जाता है जिसमें मृत आत्माओं की तृप्ति के लिए पूरा वातावरण दीपों और दीपमालाओं से जगमगा उठता है। यहपरंपराजीवन और मृत्यु के बीच गहरे संबंध को दर्शाती है

एक और रोचक परंपरा इंद्र की माता की कहानी है। कहा जाता है कि इंद्र की माता को विशेष प्रकार के फूलों की आवश्यकता थी इंद्र उन फूलों की तलाश में पृथ्वी पर आए और लोगों ने उन्हें पकड़ लिया बाद में उनकी पहचान उजागर हुई और उन्हें देवता के रूप में पूजा जाने लगा इसी की स्मृति में इंद्र जात्रा का आयोजन किया जाता है। इस कथा का नाट्य रूपांतरण और लोकगीतों के माध्यम से प्रदर्शन किया जाता है

राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि >

इंद्र जात्रा की एक और परंपरा जनता और शासक के बीच आपसी जुड़ाव है प्राचीन काल में नेपाल के राजा स्वयं इस उत्सव में कुमारी के दर्शन करने और जनता के साथ उत्सव में शामिल होने आते थे। इससे यह उत्सव न केवल धार्मिक दृष्टि से बल्कि राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से भी अत्यंत महत्वपूर्ण हो गया। आज भी राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री जैसे नेता इसमें भाग लेते हैं जिससे इस परंपरा का महत्व और भी बढ़ जाता है

इंद्र जात्रा की प्राचीन परंपराएँ दर्शाती हैं कि यह उत्सव केवल पूजा या उत्सव तक सीमित नहीं है बल्कि यह नेपाल की संस्कृति आस्था और लोककथाओं का एक जीवंत संग्रहालय है हर नृत्य हर रथ यात्रा हर दीप और हर भजन के पीछे सदियों पुरानी परंपराओं और मान्यताओं की गहराई छिपी है यही कारण है कि यह उत्सव न केवल नेपालियों के लिए गौरव का विषय है बल्कि दुनिया भर से आने वाले पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बन गया है

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इस त्यौहार के दौरान भक्त उपवास रखते हैं और विशेष प्रार्थनाएँ करते हैं मंदिरों में घंटों पूजा-अर्चना चलती है और शहर के हर कोने में भक्तिमय वातावरण छा जाता है रात में दीपों की रोशनी और ढोल-नगाड़ों की ध्वनि पूरे काठमांडू को आध्यात्मिक आभा से भर देती है

इन्द्र जात्रा मुखर लोकनृत्य काठमांडू सांस्कृतिक का केंद्र

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