जाने किस दिन करे हैं श्राद्ध अगर मृत्यु की तिथि पता ना हो

जाने किस दिन करे हैं श्राद्ध अगर मृत्यु की तिथि पता ना हो

हिंदू धर्म में पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए किया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण कर्मकांड श्राद्ध है जब किसी परिजन की मृत्यु हो जाती है तो पितृ पक्ष में उनकी तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है लेकिन कई बार ऐसा होता है कि मृत्यु की सही तिथि ज्ञात नहीं होती। ऐसे में प्रश्न उठता है कि श्राद्ध कब किया जाए ताकि पूर्वजों की आत्मा को संतुष्टि मिल सके और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहे

यदि मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो श्राद्ध करने के लिए सबसे उपयुक्त दिन सर्वपितृ अमावस्या माना जाता है यह दिन पितृ पक्ष की अंतिम तिथि होती है और इसे महालय अमावस्या भी कहते हैं धार्मिक मान्यता के अनुसार इस दिन उन सभी पूर्वजों का श्राद्ध किया जाता है जिनका श्राद्ध किसी कारणवश छूट गया हो या जिनकी तिथि ज्ञात न हो यही कारण है कि इसे “सर्वपितृ अमावस्या” कहा जाता है क्योंकि इस दिन सभी पूर्वजों की आत्माओं को सामूहिक रूप से याद किया जाता है और तर्पण किया जाता है।

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पितृ पक्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा से प्रारंभ होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक चलता है। इन सोलह दिनों में प्रतिदिन किसी न किसी तिथि को श्राद्ध करने का प्रावधान है यदि मृत्यु तिथि ज्ञात हो तो उस तिथि पर श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना जाता है किन्तु जब तिथि ज्ञात न हो, या परिवार में किसी को सही तिथि ज्ञात न हो तो अमावस्या को श्राद्ध करना श्रेष्ठ माना जाता है

श्रद्धा का महत्व न केवल धार्मिक बल्कि सांस्कृतिक दृष्टि से भी अत्यंत गहन है हिंदू मान्यता के अनुसार व्यक्ति जन्म से ही तीन प्रकार के ऋण लेकर आता है – देव ऋण ऋषि ऋण और पितृ ऋण पितृ ऋण चुकाने का एकमात्र साधन श्राद्ध और तर्पण है मान्यता है कि यदि पूर्वजों का श्राद्ध न किया जाए तो उनकी आत्मा अधूरी रह जाती है और वे वंशजों से संतुष्टि की अपेक्षा रखते हैं। इसलिए मृत्यु तिथि न होने पर भी अमावस्या को श्राद्ध करना अनिवार्य माना जाता है

श्राद्ध की विधि इस प्रकार है। प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करके किसी पवित्र स्थान पर आसन बिछाकर बैठें। कुश तिल और जल से तर्पण करें यह क्रिया सूर्य की ओर मुख करके की जाती है। तर्पण के बाद पिंडदान किया जाता है जिसमें पितरों के नाम पर चावल जौ और तिल से बने पिंड अर्पित किए जाते हैं। इस क्रिया के साथ ही जल अर्पित करके पितरों का आह्वान किया जाता है। श्राद्ध का एक महत्वपूर्ण अंग ब्राह्मण भोजन है इस दिन ब्राह्मणों को आमंत्रित करके सात्विक भोजन कराया जाता है और वस्त्र फल और दक्षिणा दी जाती है। ये सभी कार्य पूरीश्रद्धाऔर पवित्रता के साथ करना आवश्यक है

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सर्वपितृ अमावस्या के दिन किए गए श्राद्ध का विशेष महत्व है शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन किया गया तर्पण सभी पितरों तक पहुँचता है और वे प्रसन्न होकर परिवार को आशीर्वाद देते हैं यदि किसी व्यक्ति के पितरों का श्राद्ध कई वर्षों से नहीं किया गया हो तो भी इस दिन एक बार किया गया श्राद्ध उनकी आत्मा को तृप्त कर सकता है

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार यदि कोई व्यक्ति अमावस्या के दिन अपने पूर्वजों का श्राद्ध नहीं करता है तो पूर्वज रुष्ट होकर वंशजों को जीवन में अनेक कष्ट दे सकते हैं। वहीं श्रद्धा और विश्वास के साथ किया गया श्राद्ध परिवार में सुख समृद्धि और संतुष्टि लाता है। इसलिए मृत्यु तिथि ज्ञात न होने पर भी श्राद्ध अवश्य करना चाहिए।

श्राद्ध का यह अनुष्ठान न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है, बल्कि यह हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का एक माध्यम भी है यह हमें संदेश देता है कि हमारी वर्तमान पीढ़ी न केवल हमारे प्रयासों का परिणाम है बल्कि हमारे पूर्वजों के योगदान और आशीर्वाद का परिणाम है। जब हम श्राद्ध करते हैं, तो हम केवल कर्मकांड ही नहीं करते बल्कि अपने भीतर कृतज्ञता और विनम्रता का भाव भी विकसित करते हैं

अंततः यह कहा जा सकता है कि यदि किसी प्रियजन की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध करना सर्वोत्तम होता है इस दिन पूर्वजों को याद करने तर्पण और पिंडदान करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहता है श्राद्ध हमें सिखाता है कि अपने पूर्वजों का सम्मान करना और उन्हें श्रद्धापूर्वक याद करना जीवन का अनिवार्य कर्तव्य है

श्राद्ध क्या है जाने विधि नियम औरधार्मिक मान्यताएँ

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